रविवार, 1 मार्च 2009

आइफा जैसे समारोह झारखण्ड में हो....



विगत कुछ दिनों से झारखण्ड की फिल्मी दुनिया "जॉलीवुड" के विकास के बारे में सोंच ही रहा था कि मेरे पिताजी का निधन हो गया इसलिए लगभग १२-१३ दिनों तक अब घर पर ही रहना हो रहा है। घर में ही कुछ कागज़ पत्तर उलट रहा था कि अखबार के एक कतरन पर नज़र पड़ी कि "आइफा जैसे समारोह झारखण्ड में हो.... तो हजारों टूरिस्ट आकर्षित होंगे और इसके लिखने वाले हैं ... "लन्दन से अजय गोयल" उन्होंने लिखा है कि हिन्दी फिल्मों के लिए दिए जाने वाले आइफा अवार्ड मेरे गृह नगर लन्दन में होने की सूचना थी पर यह हुआ योर्कशायर में... जो कि एक छोटा सा काउंटी है यानि एक जिला है। एक सप्ताह तक चले इस समारोह को मीडिया ने भी खूब कवर किया। भारतीय मूल के लगभग १५००० लोग इस समारोह में शामिल हुए। योर्कशायर ने भारतीय कलाकारों को लाने में जो लाखों स्टर्लिंग पाउंड खर्च किए उसे अब वे लोग भुनाने में लगे हैं। वे चाहते हैं कि भारतीय फ़िल्म मेकर योर्कशायर आ कर फ़िल्म कि शूटिंग करें। योर्कशायर में हुए यह कार्यक्रम किसी "जंगल में मंगल" के सामान था। मुझे आश्चर्य हुआ कि इस तरह के कार्यक्रम भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में क्यों नही आयोजित होतें हैं ? इससे वहां के लोगों को रोजगार भी मिलेगा और वे आर्थिक रूप से सुदृढ़ भी होंगे। यदि बॉलीवुड, योर्कशायर को दुनिया के नक्शे पर ला सकता है तो झारखण्ड जैसे राज्य को क्यों नही ? यदि झारखण्ड जैसे राज्य में इस तरह के आयोजन होंगे तो वहां भी हजारों टूरिस्ट आकर्षित होंगे। यदि राज्य सरकार और स्थानीय व्यवसायी ऐसे प्रोजेक्ट में पैसे लगायें तो राज्य में टूरिस्म को बढावा मिल सकता है। मैं ऐसे पॉँच करोड़पतियों को जानता हूँ जो झारखण्ड में ऐसे समारोह को स्पांसर कर सकते हैं। हालाँकि लन्दन से योर्कशायर मैं नही गया लेकिन ऐसे समारोह अगर रांची में हो तो मैं फ्लाईट लेकर वहां जरूर जाऊँगा। फ़िर भी मुझे संदेह है कि लोग झारखण्ड को विश्व के नक्शे पर आसानी से खोज लेंगे। लेकिन बॉलीवुड का मतलब उम्मीद और सपने दिखाना है और मेरा सपना है आइफा २००८ झारखण्ड यानी "जॉलीवुड" में हो।
इस अखबारी कतरन को पढ़ कर मैं सोंच रहा था कि लन्दन में बैठा एक अजय गोयल नाम का आदमी यहाँ की आर्थिक स्थिति के बारे में इतना सोंच सकता है तो अगर यहाँ के लोग इस तरह की सोंच रखें तो क्या झारखण्ड स्वर्ग नही बन जायेगा ?


शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

अशोक अंचल जी के साथ बिताये कुछ पल....



क्सर अंचल जी मेरे स्टूडियो में आया करते थे और घंटों हम दोनों बैठ कर फ़िल्म, नाटक, म्यूजिक के बारे में योजनायें बनाया करते थे। मुझे काम करते देख वे अक्सर कहा करते थे कि " अंकन जी, आप तो एक पूरा पैकेज हैं , स्क्रीनप्ले लिखने से लेकर एडिटिंग और फाइनल प्रोडक्शन तक का सारा काम आप ख़ुद ही करते हैं और वह भी एक ही छत के नीचे ...." दरअसल अंचल जी रांची जैसे छोटे शहर में फ़िल्म बनाने की मुश्किलों से पूरी तरह वाकिफ थे कि यहाँ एक छोटी सी भी फ़िल्म बनाने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। इस दिशा में उनकी दृष्टि काफी दूर तक जाती थी। शायद इसलिए ही उन्होंने मुझे पूरा पैकेज कहा था।


१९९५ में अंचल जी की कुछ कविताओं के संकलन को उन्ही के स्वर में मैंने रिकॉर्ड किया था। उनके अचानक दुनियावी रंगमंच को छोड़ कर चले जाने से आहत मैं उन्ही के बारे में सोंच रहा था कि उनके उसी कविता संकलन की याद आ गयी और मैं उसका मास्टर कैसेट खोजने में लग गया। थोड़े ही प्रयास के बाद मुझे सफलता मिल गयी। उनकी कविताओं को सुनते सुनते मैं अंचल जी की यादों में खो गया.....

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

मेरे मन की बात...

कलाकार आज इतना उपेक्षित हो जाएगा मैंने कभी सोचा भी न था। कुछ दूर पीछे देखने पर छऊ सम्राट केदार साहू , प्रसिद्ध रंगकर्मी चितरंजन प्रसाद , सुरेन्द्र शर्मा और अशोक अंचल, प्रसिद्ध नाटककार सिद्धनाथ कुमार आदि के नाम जेहन में उभरते हैं और साथ ही मन में एक टीस उठती है कि क्या झारखण्ड की धरती कलाकारों से इतनी तेजी से वीरान होती रहेगी ? इन कलाकारों को याद करने वाले भी क्या सिर्फ़ इन्ही के घर वाले होंगे ? क्या हमारा या समाज का कोई दायित्व नही बनता है उन्हें याद रखने के लिए ? फ़िर मेरा मन पूछता है झारखण्ड की सरकार से..... कि क्या सरकार के पास कोई ऐसी नीति नही जो उन कलाकारों की तमाम कृतियों को सहेज कर रख सके ? मन बड़ा बेचैन होता है मेरा यह देखकर कि यहाँ तो सारे तंत्र-मंत्र, केवल और केवल दूरदृष्टि विहीन नेताओं के इर्द गिर्द घूमते हुए सिर्फ़ उन्हें ही महिमामंडित करते हैं। अब तो सभी को ऐसे नेताओं से घृणा होने लगी है। प्रदेश कि सारी व्यवस्था ध्वस्त होती नज़र आती है बावजूद इसके आम जनता इन्ही नेताओं से उम्मीद लगाये बैठी है। सुबह से शाम तक आम आदमी मशीन की तरह खटता रहता है और उसके पसीने की बूंद की कीमत वसूलते नज़र आते हैं यही नेता।

मेरा तो मन करता है कि कोई ऐसा संग्रहालय बनाया जाय जिसमे यहाँ के कलाकारों कि कृतियों और प्रस्तुतियों को ऑडियो - विजुअल तकनीक अथवा डॉक्युमेंटरी फिल्मों के माध्यम से संरक्षित किया जा सके ताकि आने वाली पीढियों के लिए एक उदहारण प्रस्तुत किया जा सके और यह काम बिना सरकारी मदद के ख़ुद से ही कलाकारों को करना होगा। मैं इस तरफ़ कदम बढ़ा चुका हूँ और मुझे कलाकारों का साथ चाहिए।


मेरे पिता मेरे गुरु...

दिनांक २३ फ़रवरी २००९ को मेरे पिता श्री जगदीश नारायण "पवन जी" का देहावसान हो गया। वे ९३ वर्ष के थे। वे परनाती -परपोतों वाला भरा पूरा परिवार छोड़ गए।

मेरे पिता मेरे गुरु भी थे। उनसे मैंने चित्रकारी और लेखन की कला सीखी थी। आकाशवाणी की स्थापना काल से ही वे वहां के मान्यताप्राप्त नाट्य लेखक थे साथ ही १९३६ से लेकर १९५० तक रांची में रंग आन्दोलन के सजग प्रहरी भी बने रहे। चर्चित साहित्यकार राधाकृष्ण (जिनके नाम से राधाकृष्ण पुरस्कार दिया जाता है) के परम मित्रों में थे मेरे पिता जी जगदीश बाबु। पिता जी का राधा बाबु के साथ खूब उठना बैठना और लेखन पर विमर्श करना होता रहता था।

स्वतंत्रता आन्दोलन में भी मेरे पिता जी शामिल हुआ करते थे। जब कभी वे मूड में रहते थे तो स्वतंत्रता आन्दोलन की बातें बताया करते थे और उसमे अपनी भागीदारी का जिक्र करके एक ऐसा चित्र खींच दिया करते थे जैसे सारी घटनाएँ सामने घट रही हों । हम सुनने वाले भाई बहन भी उर्जा से भर जाया करते थे।

कहीं न कहीं उन्ही जज्बातों के कारण ही उनकी तरफ़ मैं भी खिंचा चला जाता था। उनकी सहजता और सरलता किसी से छिपी नही थी। वे हमेशा कहा करते थे की " सादा जीवन उच्च विचार" और अब मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि" यही था उनका जीवन सार" ।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2007

नीलू कोहली ने सिखाया अभिनय

Jollywood मे इन दिनों अभिनय सीखने का दौर चल रहा है। बच्चे बूढ़े लडकियां लडके सभी अभिनय सीखना चाहते हैं। हाल के दिनों मे जौलीवुड मे अभिनय के कई वर्कशौप लगाए गए। उन्ही वर्क शौप मे बौलिउड एवम तव कि मशहूर अभिनेत्री नीलू कोहली झारखण्ड कि राजधानी रांची आयी हुई थी।
नीलू ने अपने अनुभवों को यहाँ के लोगो के साथ बाँटा और अभिनय के कई गुर सीखाये। उन्होने कहा कि रील लाइफ और रियल लाइफ मे बहुत ही अंतर होता है। फिल्मी करिअर मे पैसा और ग्लैमर तो बहुत है किन्तु अपनी पहचान बना कर टिके रहना बहुत ही मुश्किल है।